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دَرّاجـتي
في
نُـزْهَـتي
أُحِـبُّـها
لأنَّــنـــي |
أرْكَـبُـها
فـي
فَـرْحَةِ
أجـوبُ فـيها
قَرْيَــتي |
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وَقَــرْيَـتي
حُـقولُـها
وَقَـرْيَــتي
جَـميلـةٌ |
كَأنّـهــا
فـي
الـجَـنّةِ
مَـرْسومـةٌ
كاللَّـوْحَــةِ |
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أطــوفُ
يَـوْمّـيًا
بِها
مَـضَـيْتُ
أدْعو رِفْقَتي |
مِـنْ
حَارةٍ
لِـحـــارةِ
وبــاحِـثـًا
عَنْ حاجَتي |
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دَرّاجــتي
أنــيقَــةٌ |
وَسَـيْـرُها
في سُـرْعَـةِ |
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لــكِـنَّـني
مُــحاذِرٌ |
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والـخَـوْفُ
كُلُّ
الـخَوْفِ |
مِــنْ
مَـخاطِرِ
السيارةِ |
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